शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011


दरवाजा खेाल दो
                               युग सो रहा है
बरसों बीत गये
काल के भाल पर
अपना कुकुंम अंकित किये
तुम मुझे अंक दो
बस दरवाजा खोल दो।
बीजारोपण तो हुआ है
जरूरत है सिंचन की
तुम मुझे सिंचन दो
बस दरवाजा खोल दो।
लहलहाये वो सपने भी
जिन्‍हें तुमने तकीये के नीचे
दबा दिया
अब उन्‍हें जगा दो
बस दरवाजा खेल दो।
चंदन की तरह लिपटे हो
 लालसा में मुक्‍त करो
युग को नव धारा दो
बस दरवाजा खेल दो।
घने वन में चंद्र छिपा है
सत्‍य को मिटाकर झूठ से
कक्ष तेरा भरा है
अब सत्‍य को आवाज दो
बस दरवाजा खोल दो।
प्रभा जैन
16(311 शास्‍त्री नगर
खटोदरा कालोनी
सुरत-2
मो-9723544153

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