शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011


दरवाजा खेाल दो
                               युग सो रहा है
बरसों बीत गये
काल के भाल पर
अपना कुकुंम अंकित किये
तुम मुझे अंक दो
बस दरवाजा खोल दो।
बीजारोपण तो हुआ है
जरूरत है सिंचन की
तुम मुझे सिंचन दो
बस दरवाजा खोल दो।
लहलहाये वो सपने भी
जिन्‍हें तुमने तकीये के नीचे
दबा दिया
अब उन्‍हें जगा दो
बस दरवाजा खेल दो।
चंदन की तरह लिपटे हो
 लालसा में मुक्‍त करो
युग को नव धारा दो
बस दरवाजा खेल दो।
घने वन में चंद्र छिपा है
सत्‍य को मिटाकर झूठ से
कक्ष तेरा भरा है
अब सत्‍य को आवाज दो
बस दरवाजा खोल दो।
प्रभा जैन
16(311 शास्‍त्री नगर
खटोदरा कालोनी
सुरत-2
मो-9723544153

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

mangne ki kala



मांगने की कला ने आज बाजार में अपना प्रभुत्‍व जमा लिया है। शर्म मांगने वालो को नहीं आती जो देने में असमर्थ हो तथा जिसे देने में हिचकिचाहट हो रही हो। शर्मिन्‍दा वो हो जिन्‍होने देना नहीं सीखा मांगने वालों को क्‍युं आये। मांगने निकल पडे तो शर्म कैसी।
हमारे दादाजी एक बात सदा कहा करते थे- मांगन मरन समान है मत कोई मांगो भीख मांगन से मरना भला यह सदगुरू की सीख। यही सीख उन्‍होनें अपना ली तथा उनकी दी हुई सीख हमने भी धार ही रखी थी।पर आज की स्थिति बदल गयी है।
प्‍याज सौ रूपये किलो बिकने चले हैं अब घर में पावभाजी बनाने का मन हो गया तो क्‍या करें अपने घर तो इतनी मंहगी सब्‍जी का आगमन हो नहीं सकता इसलिए सोचा पडोस का द्रवार खटका लिया जाय। वो तो लाते ही होंगे। हमारी एक सहेली को मांगने की ये अच्‍छी आदत थी। पडोसन के पास गयी एक प्‍याज मांग लायी। अब बारी लहसुन की थी तो दूसरे द्वार पर दस्‍तक देने पहुंच गयी। हम ये देख कर हैरान थे कि कोई मांग कर अपने मेहमान का स्‍वागत कैसे कर सकता है । ज्‍यादा हैरानी तो तब हुई जब उस पडोसन ने यह कहा कि लहसुन घर में नहीं है। बेचारी कितनी शर्मिन्‍दगी महसुस कर रही थी। इस पर हमारी सहेली तुनक कर बोली ---- क्‍या भाभी लहसुन भी नहीं रखते। अब देखिये क्‍या हालात हो गये हैं एक तो मागंने जाना उस पर अपनी ही धोंस । क्‍यों भई तूने उसे ठेका दे रखा था क्‍या कि महंगी सब्‍जीयां रखनी ही होगी जाने कब हमारी पडोसन को जरूरत पड जाये। तुम भी तो महंगी सब्‍जीयां घर में ला सकती हो ।खाने का शौक पाला है तो खर्च करना भी आना चाहिए।
एक बार मेरे पति के दोस्‍त के बेटे का जन्‍म दिन मनाया जा रहा था। कुछ दोस्‍त ही शामिल थे। आस पडोस के लोगों को खाने पर तो बुलाया नहीं केक काटते वक्‍त दिखावटी भीड इक्‍क्‍ठा् कर ली ताकि गिफट आ सके। बच्‍चे को भी पहले से ही सीख रखा था कि सभी से गिफ्ट मा्ंगने की तैयारी कर लो। उनमें से एक पडोसी बच्‍चा गिफ्ट नहीं ला पाया वजह जो भी रही हो तो—उसे उपालम्‍भ देना आवश्‍यक हो गया । दोस्‍त की पत्‍नी बोल पडी जाओ तुम पहले गिु्ट लेकर आवो फिर ही केक खाने को मिलेगी। बेचारा केक के लालच मे रोता हुआ मां के पास गया । घर में गिफ्ट ना हो तो मां बेचारी क्‍या करे। किसने हक दिया उसके बच्‍चे को रूलाने का तेरे बेटे का जन्‍म दिन है तो क्‍या तुझे अधिकार है किसी ओर बच्‍चे के होठों से हंसी छिनने का। मां ने उसके हाथों में 100 रूपये  का लिफाफा पकडा दिया। 100 रूपये पर दस रूपये की केक खाने को मिली। ऐसे हादसों का शुक्रिया अदा करना कोइ्र बडी बात नहीं। वो तो यूं ही होते रहते हैं।
भला मांगने में कैसी शर्म मुंह है तो मांगने के लिए क्‍यूं हिचक हो। उसी वक्‍त का एक किस्‍सा ओर याद आ गया। एक परिवार और शामिल था उनके साथ उनका बच्‍चा भी बच्‍चे को देवरानी कहने लगी मैं रविवार को घूमने जाउंगी तुम अपनी गाडी ले आना तुझे भी घुमा दूंगी। अरे भई घूमने का इतना शैाक पाल रखा है        
namaskar